सिमटते रिश्ते

यदि आपकी उम्र कम से कम 30 वर्ष या उससे ऊपर है तो निश्चित रूप से आप रिश्तों के ऐसे संसार से सम्बन्ध रखते हैं जहाँ माँ, बाप, भाई, बहन, दादा, दादी, नाना, नानी, सास, ससुर, पति, पत्नी, मामा, मामी, जीजा, दीदी, फूफा, बुआ, मौसी, मौसा, चाचा, चाची, भैया, भाभी, देवरानी, जेठानी, देवर, ननद, भतीजा, भतीजी, भांजा, भांजी इत्यादि नाम के रिश्ते होते हैं l और यह कोई सदियों पुरानी बात नहीं है, मात्र दो दशक पहले कि बात है, लेकिन समय बदला और हम एक नए सामाजिक परिवेश का निर्माण करने लग गए l तर्क यह कि हम एक विकसित भारत का निर्माण करेंगें, भारत को विश्व गुरु बनायेंगें, भारत को विश्व शक्ति बनायेंगें इत्यादि और दूसरी तरफ हम अपनी हज़ारों लाखों साल पुरानी संस्कृत की दुहाई देना भी नहीं भूलते हैं l और आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी देश आज कहाँ खड़ा है यह किसी से छिपा नहीं है अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है l यानी हम 'धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का' और 'करैला एवं नीम चढ़ा' नामक प्रचलित मुहावरों को चरितार्थ करने लग गए l इस विकसित, विश्व गुरु, विश्व शक्ति इत्यादि की आप-धापी में हमारे रिश्तों का संसार तेज़ी से सिमटने लग गया और हम रिश्तों के संसार के न्यूनतम अंकों तक पहुँचने वाले हैं अर्थात आने वाले समय में एक हम होंगें दूसरा माँ/बाप और तीसरा दादा/दादी/नाना/नानी यानि कुल तीन लोगों का हमारा संसार होगा इस स्थिति के लिए पहला कारण है हमारी मानसिकता दूसरा सरकारी नीतियां और तीसरा सरोगेसी टेक्नोलॉजी (IVF-IN VITRO FERTILISATION PROCESS) l सरोगेसी एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जिसका प्रयोग निःसंतान दंपत्ति अपना परिवार या वंश आगे बढ़ाने के लिए करते हैं l निश्चित रूप से यह साइंस का मानव जाति को दिया गया एक अद्भुत वरदान है l क्या यह वरदान धीरे-धीरे समाज के लिए एक अभिशाप भी बनता जा रहा है ? यहाँ हमें नहीं भूलना चाहिए कि अल्ट्रासाउंड टेक्नोलॉजी भी एक वरदान है, लेकिन भ्रूण हत्याओं में जब इसका जमकर प्रयोग होने लगा तब सरकार ने इस पर भी कानून बना दिया था l लेकिन अब यह सरोगेसी टेक्नोलॉजी धीरे धीरे एक फैशन का रूप लेने लग गया है l चूँकि अभी यह काफी खर्चीला है, इसलिए आर्थिक रूप से संपन्न लोग ही इसका फायदा ले पा रहे हैं l लेकिन समय के साथ साथ इसमें भी कमी आएगी और यह हर आदमी की पहुँच में होगा बिल्कुल वैसे ही जैसे पहले और अब मोबाइल फोनों की स्थिति l उदाहरण के लिए सिने जगत के तुसार कपूर और एकता कपूर का केस ले लीजिये l तुसार कपूर सरोगेसी टेक्नोलॉजी से बाप बन गए और उनके बच्चे को दादा और दादी तो मिल गए लेकिन नाना और नानी वाला खाना खाली हो गया और भविष्य में यदि इनके बच्चे ने भी यही पद्धति अपनायी तो क्या होगा अर्थात उसके बच्चे के पास सिर्फ रिश्तों के नाम पर केवल वह स्वयं होगा/होगी और साथ में उसका बाप (लक्ष्य)एवं दादा (तुसार) अर्थात कुल तीन आदमी l इसी तरह एकता कपूर सरोगेसी टेक्नोलॉजी से माँ तो बन गयीं और उनके बच्चे को नाना और नानी तो मिल गए लेकिन दादा और दादी वाला खाना खाली हो गया और भविष्य में यदि इनके बच्चे ने भी यही पद्धति अपनायी तो क्या होगा अर्थात उसके बच्चे के पास सिर्फ रिश्तों के नाम पर केवल वह स्वयं होगा/होगी और साथ में उसका बाप एवं दादी (एकता) अर्थात कुल तीन आदमी l सरोगेसी टेक्नोलॉजी से जो लोग माँ या बाप बन रहे हैं और उन सबके अपने-अपने कारण निश्चित रूप से होंगे l लेकिन देखने में यह आ रहा हैं कि जो लोग साधारण या प्राकृतिक रूप से माँ या बाप बन सकते हैं वो भी इस पद्धति का प्रयोग कर रहे हैं l ऐसे लोगों की संख्या देश में तेज़ी से बढ़ रही है l ऐसा क्यों हैं यह सोच का नहीं शोध का विषय होना चाहिए..? हम कहाँ से कहाँ आ गए और कहाँ जायेंगें किसी को कुछ पता नहीं हैं l विवाहित जीवन असफल हो रहे हैं, तलाक़ की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं, अविवाहित लोगों की संख्या बढ़ रही है, बच्चों की परवरिश दिनों दिन महंगी होती जा रही है, लोग आर्थिक बोझ के नीचे दबते जा रहे हैं, स्वास्थ के अलावा महिलाओं के व्यक्तिगत कारण भी हैं, इत्यादि-इत्यादि l क्या ये भी एकल माँ/बाप (Single Parent) बनने का एक कारण हो सकता है ...?
समय मिले तो विचार ज़रूर कीजियेगा ...?
अग्रिम धन्यवाद !

लेखक एवं प्रस्तुति सुभाष वर्मा Writer-Journalist-Social Activist www.LoktantraLive.in loktantralive@hotmail.com

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