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Showing posts from June, 2017

आप का काम

     " कविता"     आप का काम आयु बढ़ रही है या घट रही है , ये सोचना आप का काम है , देश बढ़ रहा है ज़रूर लेकिन , सुख या कष्ट की तरफ   या , विकास या विनाश की तरफ , ये सोचना आप का काम है   l देश बढ़ रहा है ज़रूर लेकिन , बेरोज़गारी , ग़रीबी , बदहाली , हताशा , निराशा , कुंठा , भय , आक्रोश , आशंका में तो नहीं , बदलाव कैसा चाहिए आपको, ये सोचना आप का काम है   l देश बढ़ रहा है ज़रूर लेकिन , किसके लिए - किसके साथ , किस सोच से - किसके सोच से , किस नियत से - किसकी नियत से , देश वढ़ रहा है या वढ़ रहा है , ये सोचना आप का काम है   l # Subhash Verma # Feedback at  loktantralive@hotmail.com

थोड़ा इंतज़ार कर

“ कविता ”          थोड़ा   इंतज़ार   कर अच्छा कर - बुरा कर , पुण्य कर - पाप कर, छल कर - कपट कर , खूब कर - खूब कर  जी - जान से कर , जोर - शोर से कर , एक दिन तेरा भी आएगा , जब तेरे गुणों का होगा बखान , जो तुमने न किये होंगें , न ही तुमने सोचें होंगें , तेरे दुश्मन भी पढेंगें कशीदें , तेरी खूबिओं के चुन चुन के , बस थोड़ा इंतज़ार कर , उस दिन का - जिस दिन तूँ शमशान में आएगा नहीं , शमशान में लाया जायेगा । थोड़ा   इंतज़ार   कर…………..! #   Subhash Verma #  Feedback at  loktantralive@hotmail.com

सत्ताविहीन नेता का “चुनावी राग”

"व्यंग्य" सत्ताविहीन नेता का “चुनावी राग” एक सत्ताविहीन नेता का चुनावी राग कैसा हो सकता है ये हमने व्यंग के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है l भाइयों एवं बहनों आपको आजतक जो कुछ भी मिला है वह जितना आपका हक़ है उससे बहूत कम है l बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है l नौजवानों मे हताशा, निराशा, कुंठा, आक्रोश बढ़ता जा रहा है l अपराध, बलात्कार, कोर्ट में केस में बढ़ोत्तरी हो रही है l मतलब लोगों में असुरक्षा एवं भय बढ़ी है l बेघर एवं भुखमरी बढ़ती जा रही है l अब मीडीया भी इसको दिखा रहा है लेकिन सरकार मस्त है l मंहगाई बढ़ गयी है l आवास एवं समान लोगों की पहुँच से दूर हो रहे हैं l मतलब लोगों का हाल बहाल है लेकिन सरकार मस्त है l व्यापारी भी मस्त है लेकिन जनता पस्त है l ग़रीब को नाममात्र की सब्सिडी दी जा रही है l जबकि सत्तापक्ष मुफ़्त में मज़े ले रहा है l आरक्षण का फ़ायदा मजबूर को नहीं मजबूत को दिया जा रहा है l भ्रष्टाचार एवं लूट के मामले बहूत बढ़ गये हैं लेकिन सरकार मस्त है l आत्महत्या, मानसिक शोषण, आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण के

सत्ताधारी नेता का “चुनावी राग”

"व्यंग्य" सत्ताधारी नेता का “चुनावी राग” एक सत्ताधारी नेता का चुनावी राग कैसा हो सकता है ये हमने व्यंग के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है l भाइयों एवं बहनों आपको आजतक जो कुछ भी मिला था हमने उससे ज़्यादा ही आपको दिया है l बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है l मतलब शिक्षित की संख्या में वृद्धि हो रही है l अपराध, बलात्कार, कोर्ट में केस में बढ़ोत्तरी हो रही है l मतलब लोगों में जागरूकता बढ़ी है l बेघर एवं भुखमरी बढ़ती जा रही है l क्योंकि अब मीडीया इसको दिखा रहा है लेकिन ये पहले से घट रही है l मंहगाई बढ़ गयी है l आवास एवं समान लोगों की पहुँच से दूर हो रहे हैं l मतलब लोगों की क्रय शक्ति बढ़ गयी है l मार्केट में इनकी डिमांड बढ़ गयी है l ग़रीब को पूरी पूरी सब्सिडी दी जा रही है l हमने आरक्षण का कोटा बढ़ा दिया है लेकिन मामला अभी कोर्ट में है l भ्रष्टाचार के मामले बहूत बढ़ गये हैं क्योंकि सरकार में पारदर्शिता बढ़ी है l आत्महत्या, मानसिक शोषण, आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण के मामले बढ़ रहे हैं मतलब जनता जागरूक हो गयी है l हॉस

सत्ताविहीन नेता की “चुनावी चाल”

"व्यंग्य" सत्ताविहीन नेता की “चुनावी चाल” एक सत्ताविहीन नेता अपने साथियों को चुनावी चाल के बारे में भाषण दे रहा है l व्यंग के माध्यम से हमने उसको प्रस्तुत करने का प्रयास किया है l साथियों चुनाव का शंखनाद हो गया है l अबतक आपने जो भी समय और धन अपने राजनीतिक जीवन में लगाया है, उसको सूद समेत वापस पाने का मौका अब आपके सामने है अर्थात् चुनाव में जीत ही आपका एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए, तभी यह संभव है l साथियों एक बात हमेशा याद रखना कि चुनाव केवल बातों और वादों से ही जीता जाता है l जितनी बड़ी बात और जितना बड़ा वादा होगा जीत उतनी ही बड़ी होगी l मोदी जी और केजरीवाल जी इसके ताज़ा उदाहरण हैं l मोदी जी ने राष्ट्रीय स्तर पर कोई काम नहीं किया था और केजरीवाल ने भी l इन्होंने केवल बातों और वादों से सत्ता हासिल की है l इसलिए चुनाव जीतने के लिए ये आपके प्रेरणा श्रोत होने चाहिए l जय हो l साथियों बातों के मध्यम से वादों की झड़ी लगा दो l वादे कैसे पूरे होंगें ये सोचने का समय नहीं है l ये कभी मत भूलना की वोटर केवल अपना फ़ायदा और तात्कालिक लाभ देखता है, दूरदृष्टि उसके पास नहीं होती

सत्ताधारी पार्टी की “चुनावी चाल”

"व्यंग्य" सत्ताधारी पार्टी की “चुनावी चाल” एक सत्ताधारी पार्टी प्रमुख नेता अपने साथियों को चुनावी चाल के बारे में भाषण दे रहा है l व्यंग के माध्यम से हमने उसको प्रस्तुत करने का प्रयास किया है l साथियों, जैसा की आप सभी जानते ही हैं कि चुनाव का ऐलान हो चुका है l अब आप को वही काम करना पड़ेगा जो आपने पिछले पाँच वर्षों में नहीं किया किया है अर्थात् जनता के बीच में जाना ही होगा l आप लोगों के मुरझाए और लटके हुए चेहरे आप की हालत को बयान कर रहें हैं l पछ्तावा, उदासी, नेगेटिविटी को त्याग कीजिए और वेशर्म और ढीठ बानिए नहीं तो जमानत जब्त हो जाएगी चुनाव में और अगले पाँच साल तक कोर्ट, जेल, वकील के चक्कर काटने पड़ सकते हैं आप को l साथियों, ये बताने की ज़रूरत नहीं कि पिछ्ले पाँच वर्षों में क़ानून व्यवस्था काफ़ी बिगड़ी है, आपराध बढ़ गये हैं, बेरोज़गारी बढ़ गयी है, आत्महत्या बढ़ गयी है आदि आदि l यही आपकी चिंता का मूल कारण है, मैं जानता हूँ l अपनी कमियों को अच्छाई और नाकामयाबी और कामयाबी साबित करना ही एक असली नेता का काम होता है l साथियों, आप सत्ता में पिछ्ले पाँच वर्षों स

आरक्षण मुक्त भारत-I

"राजनीतिक" आरक्षण मुक्त भारत-I  यह खुला पत्र या लेख या संदेश उन सभी लोगों के लिए विशेष रूप से है जो आरक्षण मुक्त भारत का सपना देख रहे हैं या आरक्षण मुक्त भारत के लिए प्रयासरत हैं l एक समय था जब लोगों का पास किसी भी मुद्दे पर अपने मन की भड़ास निकालने के लिए सीमित साधन थे जैसे - पत्रिकाएँ, समाचारपत्र, धरना, प्रदर्शन, रैली आदि l लेकिन यह सभी माध्यम उस समय भी आम आदमी के बस में नहीं था और आज भी नहीं है l लोग किसी भी मुद्दे पर अपने मन की भड़ास आपस में बात या बहस करके निकल लेते थे l लेकिन समय बदला और IT युग आया और इसने मन की भड़ास निकालने का एक सरल एवं सुगम और लगभग फ्री माध्यम लोगों के सामने उपलब्ध कराया जिसको सोसल मीडीया के नाम से जाना जाता है l इसी सोसल मीडिया पर कुछ लोग आजकल आरक्षण मुक्त भारत का सपना देख रहे हैं l आरक्षण विरोधी ढेरों अकाउंट बनाकर कर अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं और अपनी पूरी उर्जा का उपयोग इन बातों के प्रचार एवं प्रसार मे लगा रहें हैं l ध्यान देने वाली बात यह है की आरक्षण से मुक्ति या आरक्षण मुक्त भारत या आर्थिक आधार पर आरक्षण का क़ानून कौन बनाएग