आज़ादी....मेरी नज़र में

जिस तरह सब्ज़ी बनाते समय जीरा, मेथी, प्याज, लहसुन, तेज़पत्ता, मिर्च आदि को पहले खूब भुना जाता है और सब्ज़ी तैयार होने पर गार्निशिंग के तौर पर इस्तेमाल हुई हरी धनियां, पुदीना, निम्बू आदि पकवान का सारा श्रेय ले जाते हैं उसी प्रकार देश की आज़ादी में जिन लोगों ने अपनी आहुती दी उनको किनारे कर कुछ मुट्ठी भर लोग अंततः आज़ादी का श्रेय ले बैठे और अमर हो गए और आहुती देने वालों को वालों को भारत रत्न तो दूर शहीद का दर्ज़ा भी आधिकारिक तौर पर नहीं मिला, यहाँ कुछ अपवाद हो सकता है लेकिन इसको बिल्कुल खारिज नहीं किया जा सकता है l देश को आज़ाद हुए 70 वर्ष हो चुके हैं और कहने को तो हम इक्कीसवीं सदी में आ गए हैं लेकिन बहुत कुछ हमें आज भी सुनने को मिल जाता है (जैसे : इससे बढ़िया तो अंग्रेज़ों का राज था, उनके समय कानून की इज़्ज़त थी, लोग कानून से डरते थे, वो प्रतिभा की कदर करते थे, सौ साल और उनको यहाँ रहना चाहिए था, आज का सिस्टम भी उन्ही का दिया हुआ है, अगर आज वो होते तो देश की हालत कुछ और ही होती इत्यादि ) जिसके बाद हम भी सोचने को मज़बूर हो जाते हैं कि आज़ादी की परिभाषा क्या होनी चाहिए ? अभी कौन सी आज़ादी हमें मिली है और कौन सी आज़ादी अभी और चाहिए हमें ? मुझे लगता है कि लोग यूँ ही नहीं बोलते हैं l कुछ तो था अंग्रेज़ों में बल्कि मैं तो कहता हूँ कि आज भी है क्योंकि देश के युआवों की पहली पसंद विदेशी कम्पनियाँ या विदेश ही है, साल दर साल देश छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है, देश भक्ति का आलम यह है कि लोग विदेश जाने का जुगाड़ ढूंढते रहते हैं और यदि यूरोप या अमेरिका का वीज़ा आसानी से मिल जाये तो सबसे पहले यही तथाकथित देश भक्त अगली पंक्ति में खड़े नज़र आयेंगें l आज़ादी का गीत गाने वालों को इस पर भी कभी विचार करना चाहिए ? भला हो अंग्रेज़ों का जो वीज़ा नियमों में सख्ती करके लोगों को देश भक्त कहलाने का मौका दे रही है ? मज़बूरी का देश भक्त ही सही ? कहने को तो हमें भारतीय संविधान के अंतर्गत बहुत से अधिकार मिले हुए हैं, जिनमें से एक "अभिव्यक्ति की आज़ादी" नामक शब्द अक्सर हम सुनते रहते हैं l लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी का उपयोग करने वालों का क्या हश्र होता है ये हम सभी समय-समय पर देखते रहते हैं l एक लेखक और पत्रकार के रूप में भी हमें कुछ भी लिखने या बोलने से पहले कई बार सोचना पड़ता है l ऐसे में आम नागरिक की क्या औकात होगी यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है l दूसरों की छोड़ें यह मेरा स्वयं का व्यक्तिगत अनुभव है l नाम बदल गया, झंडा बदल गया, शासक बदल गया लेकिन व्यवस्था की मानसिकता नहीं बदली l शोषण करने वाला आज भी शोषण कर रहा है और शोषित होने वाला आज भी शोषित हो रहा है l तरीक़ा बदला है मानसिकता नहीं ? धन और बल की पहले भी चलती थी, आज भी चलती है और आगे भी चलती रहेगी ? जीवन में पहले भी ढेरों प्रतिबन्ध थे तो आज भी है ? लोभी और ठग पहले भी थे और आज भी हैं ? लूट पहले भी थी कुछ कानूनी और कुछ गैरकानूनी और लूट आज भी है कुछ कानूनी और कुछ गैरकानूनी ? मत भूलो चेहरा बदला है, तरीक़ा और मानसिकता नहीं ? ढूंढ सकते हो तो ढूंढों आज़ादी की परिभाषा ? देश को दिशा देने वाला नेता पहले "किसी भी तरह" सत्ता में आने का प्रयास करता है, फिर "किसी भी तरह" सत्ता में बने रहने का प्रयास करता है और फिर "किसी भी तरह" सत्ता में पुनः आने का प्रयास करने लग जाता है l गरीब को पहले भी व्यवस्था से कोई मतलब नहीं था, अमीर को कभी भी किसी भी व्यवस्था से कोई फर्क नहीं पड़ता और मध्यम वर्ग जिसकी संख्या देश में सबसे ज्यादा है वो अपने जीवन के रेल-पेल में उलझा हुआ है या उलझा दिया गया है इसलिए वो व्यवस्था या कानून को दूर से ही प्रणाम करके समझौतावादी मानसिकता वाला हो गया है l "किसी भी तरह" वर्तमान अच्छा बन जाये और "किसी भी तरह" अपना भविष्य सुरक्षित हो जाए एवं "किसी भी तरह" अपना काम निकालो ऐसी मानसिकता हम सभी की हो गयी है l सभी का ध्यान "किसी भी तरह" तक सीमित हो गया है और इसमें किसी भी परिवर्तन की कोई भी संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है l यह है आज़ाद भारत का 70 वर्षों के बाद और इक्कीसवीं सदी के भारत का कड़वा सच l यदि इसी को आज़ादी कहते हैं तो इसको "मज़बूरी की आज़ादी" कहना गलत नहीं होना चाहिए ? जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ कि देश पहले धर्मों में बंटा फिर जातियों में फिर उप-जातियों में और अब गोत्रों में बंट रहा है तथा यह प्रक्रिया ज़ारी है l सबके अपने-अपने गुट-संगठन हैं और ये सब आज़ाद भारत की व्यवस्था तंत्र की देन है l असली आज़ादी तब प्रारम्भ होगी जब पूरे देश का एक धर्म, एक जाति, एक गोत्र अर्थात केवल और केवल हिंदुस्तानी या भारतीय होगा l और यह तभी संभव होगा जब ये व्यवस्था तंत्र चाहेगा l लेकिन दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नज़र नहीं आती है l मेरी नज़र में हम झूठी आज़ादी और झूठी देश भक्ति के साथ देश में जी रहे हैं या रह रहे हैं l यहाँ तीन तरह के लोग हैं पहले वे जो हमारी बात से सहमत हैं और इसको स्वीकार करते हैं, दूसरे वो जो हमसे सहमत तो हैं लेकिन सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करते हैं और तीसरे वो जो हमारी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हैं l आप अपने आपको किस श्रेणी में पाते हैं, इसपर विचार ज़रूर कीजियेगा ? आज़ादी से सम्बंधित बहुत सी बातें जो लोगों को मालूम नहीं हैं उनको हर 15 अगस्त को देश को बताना चाहिए l विकास और खुशहाली की जो झांकी हर 26 जनवरी को निकलती है वो हर 15 अगस्त को निकालनी चाहिए ताकि देश के लोगों को पता चले की आज़ादी के इतने वर्षों बाद हम कहाँ पहुंचें हैं साथ ही हर 15 अगस्त को अगले एक साल के लिए सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के द्वारा कम से कम 10 प्राथमिकता निर्धारित करनी चाहिए और पिछले वर्ष निर्धारित प्राथमिकताओं की समीक्षा भी करनी चाहिए l "इस देश का कुछ नहीं हो सकता" या "इस देश में कुछ भी हो सकता है" इन दोनों को देश ने कई बार चरितार्थ किया है अतः आज भी बिल्कुल निराश होने की आवश्यकता नहीं है और हम सभी को "इस देश में कुछ भी हो सकता है" पर ध्यान देने की ज़रूरत है l प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी !
अग्रिम धन्यवाद ! जय हिन्द ...!

लेखक एवं प्रस्तुति
सुभाष वर्मा
Writer-Journalist-Social Activist
www.LoktantraLive.in
loktantralive@hotmail.com



Comments

Popular posts from this blog

ज़िन्दगी का मतलब

कुछ नहीं हो सकता

ज़िन्दगी का रंग और स्वाद