मज़दूर हूँ….मज़बूर नहीं

मैं मज़दूर हूँ
मज़बूर नहीं...!
ज़ीने का ज़ज़्बा हैं मुझमें
ज़िंदा हूँ मैं
ज़िंदा लाश नहीं...!
ऊपर आसमान है
नीचे तपती ज़मीन है
मंज़िल है दूर
लेकिन हौसला उससे बड़ा है...!
कोई देता नहीं सब मांगते हैं
यहाँ लक्ष्य दूर है
लेकिन पैर भी तो साथ हैं...!
नीयत साथ है और
नियति को सलाम है...!
यात्री भी हूँ मैं और
अपनों का सारथी भी हूँ मैं...!
झूठा है तेरा वादा
गन्दा है तेरा इरादा
कैसे भरोसा करूँ तुझ पर...!
ज़रूरतें हैं मेरी कम
जी लूँगा कहीं भी
लेकिन यहाँ नहीं कभी नहीं...!
इंसान हूँ मैं भी
इंसानियत जीता हूँ...!
मैं मज़दूर हूँ-मज़बूर नहीं…!


लेखक एवं प्रस्तुति
सुभाष वर्मा
लेखक एवं पत्रकार
loktantralive@hotmail.com
www.loktantralive.in

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